Khwahish

October 11, 2009 at 4:32 pm | Posted in Unsuccessful Poems | 4 Comments

बचपन से उसे देख रहा हूँ

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तब भी अकेला ही था

आज भी अकेला ही है

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वो कुत्तों का कर्म स्थल है

गरीबों का धर्म स्थल है

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बच्चों का खिलौना है

राही का बिछोना है

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चींटियों का मकान है

फलों की दुकान है

पतंगों का कब्रिस्तान है

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बहुत कुछ देखा है उसने ज़िन्दगी में

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बच्चों को हंसते खेलते देखा है

ट्रक के नीचे आके मरते देखा है

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बारातें आती हुई देखी हैं

दुल्हन की लाश एंबुलेंस में जाती हुई देखी है

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घरों को बसते हुए देखा है

घरोंदों को उजड़ते हुए देखा है

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मौसम बदलते देखे है

मिजाज़ बदलते देखे हैं

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पर वो मौन है, स्थिर है शांत है

वो अकेला है, केवल एक मूक दर्शक

वक़्त का

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उसे इंतज़ार है

किसी तेज़ आंधी का

किसी कुल्हाडी के आने से पहले

उसे अपाहिज बनाने से पहले

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एक इज्ज़तदार मौत की ख्वाहिश है उसे

उसे, जो कभी मेरा दोस्त हुआ करता था

4 Comments »

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  1. Hello,
    Well written.
    I appreciate.
    3 stars from my side.
    Keep it up.
    🙂
    Thumbs up from my side.
    Regards.
    Tito Dutta

  2. you have an awesome collection of poems do check out
    http://www.simplypoet.com,a place where poets/writers interact,comment,critique and learn from each other..it provides a larger audience to your blog!!

  3. awesome poem…
    touching!!


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