Kaifi Aazmi and Nida Fazli #2
October 8, 2009 at 9:34 pm | Posted in Jewels | 1 Commentमैं ढूंढता हूँ जिसे वो जहाँ नही मिलता,
नयी ज़मीन नया आसमान नही मिलता
s
नयी ज़मीन नया आसमान भी मिल जाए
नये बशर का कहीं कुछ निशान नही मिलता
s
वो तेग मेल गयी जिससे हुआ है क्त्ल मेरा
किसी के हाथ का उस पर निशान नही मिलता
s
वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
की जिनमे शोले तो शोले, धुआँ नही मिलता
s
जो एक खुदा नही मिलता तो इतना मातम क्यों
यहाँ तो कोई मेरा हंज़बान नही मिलता
s
खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नही मिलता
s
- कैफ़ी आज़मी(मॉस्को १९७४)
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता
कही ज़मीन कहीं आसमा नही मिलता,
s
बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले
यह ऐसी आग है जिसमे धुआँ नही मिलता
s
तमाम शहर में एसा नही खुलुस ना हो
जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नही मिलता
s
कहाँ चिराग जलाएँ, कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकान नही मिलता
s
यह क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
ज़ुबान मिलती है मगर हंजुबान नही मिलता
s
चराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है
खुद अपने घर में ही घर का निशान नही मिलता
s
Blog at WordPress.com. | Theme: Pool by Borja Fernandez.
Entries and comments feeds.


